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Thursday, July 22, 2021

Mind is napumsalinga ... Did Panini err? - Sanskrit subhashitam

|| *ॐ* || 
    " *सुभाषितरसास्वादः* "
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    " *चमत्कृति* " ( ११८ )
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*श्लोक*---
    " नपुंसकमिति  ज्ञात्वा  प्रियायै  प्रेषितं  मनः ।
      तत्तु  तत्रैव  रमते  हताः  पाणिनिना  वयम्  " ।।
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*अर्थ*----
 मन  यह  शब्द  नपुंसक  है । ऐसा  पाणिनी  का  व्याकरण  बताता  है ।
  इसी  भरोसे  पर  मैंने  अपना  मन  प्रिया  के  पास  भेजा  पर  हाय! 
   वह  पुरुष  बनकर  वही  रममाण  हो  गया । पाणिनीने  हमारा  घात  किया ।
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*गूढ़ार्थ*----
 सुभाषितकार  ने  कितने  खुबी  से  ' मन ' शब्द  पर  लिखा  है ।
 पाणिनीय  व्याकरण  में  तो  ' मन ' शब्द  नपुंसक  लिङ्ग  में  है  ही किन्तु  किसी  भी  भाषा  में  यह  शब्द  नपुंसक  लिङ्ग में  ही है ।
 मन  को  नपुंसक  सोचकर  किसी  प्रियकर  ने  बिनधास्तता  से  ' मन ' को  प्रिया  के  पास  भेज  दिया  यह  सोचकर  वह  तो  अपने  पास  वापस  ही  आयेगा किन्तु  हाय ! मन  ने  प्रिया  के  पास  पहुंचते  ही  खुद  को  बदल  लिया  वह  पुल्लिंग  हो  गया  और  प्रिया  के  पास  ही  रहना  उसने  पसंद किया । अब  प्रियकर  बिना  मन  का  हो  गया  तो  व्याकरणकार  पाणिनी  को  दोष  दे  रहा  है  कि -- कैसे  ' मन ' शब्द  उसने  नपुंसक लिङ्ग में  रख दिया ।  संस्कृत  साहित्य  की  यह  सब  खुबसूरती  देखते  ही  बनती है ।
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*卐卐ॐॐ卐卐*
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डाॅ. वर्षा  प्रकाश  टोणगांवकर 
पुणे  /  महाराष्ट्र 
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Kalia has come again- Gopi's sorrow - Sanskrit sloka

By the poetess वीरसरस्वती (सदुक्तिकर्णामृतम्)
Wayfarer to Mathura! Read out this message of a cowherdess at Murari's door  - "The waters of Yamuna are once again boiling with Kaliya's poison"
मथुरापथिक मुरारेरुद्गेयं द्वारि वल्लवीवचनम् ।
पुनरपि यमुनासलिले कालियगरलानलो ज्वलति ॥

The गोपीs are so overcome by sorrow at Krishna's separation they believe sending such a message is the only way thay can see him again. Or may be, the heat of separation is so unbearable the cool waters of Yamuna too burn them. And they, in their innocence, blame it on Kaliya.

simple sentences in sanskrit using में

में
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(१) वह एक कुंए में गिर गया= स कूपे अपतत्।

(२)मैंने इन आमों को दोनों भाइयों में बांटा = अहम् एतानि आम्राणि उभयो: भ्रात्रो: मध्ये वितरितवान्।

(३)मैंने इन आमों को तीनों भाइयों में बांटा = अहम् एतानि आम्राणि त्रिषु: भ्रातृषु: मध्ये वितरितवान्।

(४) उसके सिर में पके बाल हैं = तस्य शिरसि पलितानि सन्ति।

(५) मैं इस कमिटी में हूं और तुम उस बोर्ड में हो = अहम् अस्मिन् अधिसमीतिम् अस्मि त्वञ्च तस्मिन् अधिमण्डलम् असि।

(६)उसका नाम लिस्ट में नहीं है = तस्य नाम सू्च्यां नास्ति।

(७)मेरा नाम वोटर लिस्ट में नहीं है = मम नाम मतदातृसूच्यां नास्ति।

(८)मैंने एक देशी नस्ल की गाय दस हजार रुपए में खरीदी = अहं दशसहस्ररुप्यकेन एकां प्राकृतिकां गां क्रीतवान्।

(९)सरकारी आदमी अक्सर छुट्टियों में ही घर जाते हैं =सर्वकरीया: कर्मचारिण: प्रायश: अवकाशकले एव गृहं गच्छन्ति।

(१०)अभी सात बजने में पांच मिनट बाकी है = इदानीं सप्तवादने पञ्चनिमेषाः ऊनाः।

(११)आपकी घड़ी में कितना बजा है =इदानीं भवत: घटिकायां कियान् समय: ?

(१२) मैंने इस सम्बन्ध में सब कुछ सुन लिया है = अहम् अस्मिन् विषये सर्वं ज्ञातवन्।

(१३)इन दोनों किताबों में कौन अधिक अच्छी है = अनयो: पुस्तकयो: किं सम्यक्तरम् ?

(१४)वह खतरे में है = स: अधिसङ्कटम् अस्ति।

Saturday, July 17, 2021

Saraswati shodashopachar pooja Sanskrit



                           रचयिता
                  पं.श्रीव्रजकिशोरत्रिपाठी
              ***********************
(१. क) आवाहनम्
हे विष्णुबाले निगमादिलीले !
                 कुबुद्धिसंन्दोहविनाशशीले !।
आवाहयामि स्थलमत्र पुष्पैः
              पूजां करोमि तव तृप्तयेहम् ।।
(ख) आसनम् 
श्वेतारविन्दासनभासमाने
                    हृदारविन्दासनविद्यमाने !।
सिंहासने शुक्लसरोजयुक्ते
          समास्व भाषे ! प्रददामि भक्त्या ।।
(ग) पादासनम्
पादारविन्दद्वयशोभनाय
               ददामि पद्मं कमले ! विनम्रम् ।
संस्थापय ब्राह्मि ! सुखाय तस्मिन्
                ज्ञानं समस्तं सततं प्रयच्छ ।।
(२) स्वागतम् 
करोमि ते स्वागतमादिरूपे !
             पुष्पाणि धृत्वा शशिकान्तिदेहे !।
आगच्छ पूजां ससुखं गृहाण
             समस्तसिद्धिं कुरु बुद्धिदात्रि !।।
(३) पाद्यम्
सुशीतलं गाङ्गजलं पवित्रं
                गन्धेन मिश्रं कुसुमप्रयुक्तम् ।
ददामि भाषे ! पदधावनाय
              गृहाण मातः ! कुशलं ददस्व ।।
(४) अर्घ्यम्
दूर्वाक्षतैर्गन्धजलं प्रमेल्य
                  कृतं मयार्घ्यं तव मोदनाय ।
प्रीत्योपचारं प्रददामि तुभ्यं
             गृहाण गिरां जनयित्रि ! पूतम् ।।
(५) आचमनीयम् 
सुशीतलं गन्धजलं सुवासं
                  सम्पादितं ते मुखशोधनाय ।
प्रीत्या ददे स्वाचमनं कुरुष्व
                 ज्ञानामृतं मे सततं प्रयच्छ ।।
(६) मधुपर्कम्
कांस्ये सुपात्रे परमोपचारं
                ददामि तुभ्यं मधुपर्कमिष्टम् ।
गृहाण सन्तोषकरं पवित्रं
         सरस्वति ! त्वां प्रणमामि नित्यम् ।।
(७) पुनराचमनम्
समाहृतं तीर्थततेः सुशैत्यं
                    नवीनतोयं परिशुद्धमन्त्रैः ।
ददे पुनः स्वाचमनं कुरुष्व
           हे वाणि ! विद्यां नितरां प्रयच्छ ।।
(८. क) पञ्चामृतस्नानम्
दुग्धेन दध्ना मधुना घृतेन
                 सितेन कृत्वा परमं पवित्रम् ।
पञ्चामृतं देवि ! ददामि तुभ्यं
              स्नात्वा ममेष्टं सफलं कुरुष्व ।।
(ख) स्नानम्
गङ्गापयोष्णीदिननाथपुत्री-
               गोदावरीपुण्यजलानि मातः !।
संगृह्य ते स्नानविधिं करोमि
              भव प्रसन्ना प्रणमामि नित्यम्।।
(९.क) वस्त्रम् 
सुश्वेतवर्णं रमणीयरूपं
                  शुभ्रांशुभं मन्त्रबलेन पूतम् ।
आच्छादनार्थं तव देहभागे
              गृहाण कट्यां बहुबुद्धिदात्रि !।।
(१०) आभरणम्
मणिक्यमुक्तारजतप्रबाल-
                   वैडूर्ययुक्तानि मनोहराणि ।
ददामि हृद्याभरणिनि तुभ्यं
              स्वाङ्गैर्मुदैतानि गृहाण मातः!।।
(११. क) गन्धः 
श्वेताभगन्धं सलिलेन घृष्टं
                   मन्त्रेण पूतं बहुवासपूर्णम् ।
ददामि ते भालपटे दयाब्धे !
               विनाशयाऽज्ञानभयं सदा मे ।।
(ख) सिन्दूरम् 
उद्यद्दिवेशाभसमं सुवर्णं
                 सिन्दूरविन्दुं तव भालभागे ।
सीमन्तदेशे परिलेपयामि
            गृहाण वागीश्वरि ! देहि बुद्धिम् ।।
(१२) पुष्पम्
श्वेताभपुष्पं तगरं च कुन्दं
            मल्लिं सिताब्जं रमणीयवासम् ।
गृहाण मातः ! परिमण्डयामि
               वाग्देवते ! वाग्विभवं ददस्व ।।
(१३) धूपः
वनस्पतीनां रससारवस्तु
                 गन्धान्वितं घ्राणसुखप्रदं च ।
संगृह्य धूपं प्रविधाय देवि !
           ददे मुदा स्वीकुरु पाहि नित्यम् ।।
(१४) दीपः
ज्योतिःप्रदं मञ्जुलवर्त्तिकाढ्यं
                  चन्द्रार्कवैश्वानरतुल्यदीपम् ।
मुखारविन्दे परिदर्शयामि
              गृहाण वीणाध्वनिशोभमाने !।।
(१५. क) नैवेद्यम् 
फलानि पक्वानि सुमिष्टकानि
               रम्भाफलं मञ्जुलनारिकेलम् ।
सुश्वेतलाजान् सितशर्कराढ्यान्
                     नैवेद्यमानन्दकरं गृहाण ।।
(ख) अन्ननैवेद्यम् 
सुमिष्टमन्नं बहुव्यञ्जनाढ्यं
                सुपायसं चर्वणयोग्यखाद्यम् ।
लेह्यं च पेयं रसपूर्णपूपं
            हे वाणि ! भोगं ससुखं गृहाण ।।
(ग) चण्डवलिः
सखी त्वदीया सहचारिणी या
               या तेऽनुषङ्गा सुखसाधनी या ।
तस्यै मुदा चण्डवलिं सुभोगाद्
              ददामि भाषे ! तव तृप्तयेहम् ।।
(घ) ताम्बूलम्
रसाढ्यपत्रं खदिरेण युक्तं
               चूर्णावलिप्तं जीरकादिपूर्णम् ।
गूवाकयुक्तं रमणीयरूपं
               ताम्बूलमेतत् कृपया गृहाण ।।
(१६. क) वन्दनम् 
हे हंसयाने सुरसेव्यमाने
                 मनीषिमाने समशास्त्रगाने !।
वीणातिलीने हरिनामगाने
               नमामि नारायणि ! पादयुग्मे।।
(ख)आरात्रिकम् 
शान्तिप्रदं वह्नियुतं शिखाढ्यं
           गन्धान्वितं दीप्तिमयं गुणाढ्यम् ।
आरात्रिकं भारति ! संददामि
              प्रीत्या सुखार्थं नितरां गृहाण ।।
(ग) पुष्पांजलिः
संगृह्य पुष्पाणि मनोहराणि
               पुष्पाञ्जलिं तैर्विनतं ददामि ।
पूजान्तकाले तव तृप्तिहेतुं
              गृहाण मातः ! सुदयां कुरुष्व ।।
    
            इति व्यासकवि - ज्ञानज्योतिः - 
         कविरश्मि - ध्यानसम्राट् - पण्डित - 

          श्रीव्रजकिशोरत्रिपाठि - विरचिता 
     श्रीसरस्वतीषोडशोपचारपूजा समाप्ता।
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श्रीसूर्योपचारपूजा
January 08, 2021
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                    सूर्योपचारपूजा                    ************ (१. क) आवाहनम्  हे सूर्यनारायण लोकबन्धो                  हे रक्तरूप त्रिगुणभिव्यक्त !। रक्तप्रसूनैः सुरभिप्रपूर्णैः                  आवाहनं ते नितरां करोमि।। (ख) आसनम्  हे पद्मधारिन् जगतः सुरक्षिन्             प्रकाशकारिन् जनकामदायिन्!। दिव्यं विनिन्द्यं सुरवृन्दकाम्यं                   सुखासनं घस्रपते ! गृहाण।। (ग) पादासनम्  प्रदीप्तकान्ते कमनीयमूर्त्ते !                    त्वत्पादशोभापरिवर्द्धनाय। विभिन्नकाष्ठै रचितं सुरम्यं                    पादासनं वस्त्रयुतं गृहाण।। (२) स्वागतम्  हे दिव्यमूर्त्ते जगदेकशक्ते                  हे विश्वचक्षू रमणीयकान्ते !। करोमि पूजां तव तृप्तयेहं              सुस्वागतं देव ! ददामि पुष्पम्।। (३) पाद्यम्  आलोकदाता तिमिरप्रहन्ता                   समस्तलोकस्य शुभप्रदाता। गन्धान्वितं पादसुखाय तोयं                  ददामि पाद्यं कृपया गृहाण।। (४) अर्घ्यम्  आरोग्यदाताखिलरोगहर्त्ता               सुवर्णकान्त्या जनशान्तिकर्त्ता। कुशेन गन्धेन सुपुष्पयुक्तम्                    अर्घ्य
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गणपतिध्यानम्
January 07, 2021
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श्रीगणपतिध्यानमाला-: (१) खण्डत्काण्डिरवं प्रचण्डभयदं यन्मुण्डशुण्डं मुहुः दृष्ट्वा नष्टवलिष्ठदुष्टचरितारिष्टं विनष्टं गतम्। दोर्दण्डद्वयदण्डितातिदुरितो मार्तण्डचण्डप्रभः तच्छुण्डेन विखण्ड्य दण्डमवतु ब्रह्माण्डभाण्डस्य नः।। (२) व्याघातौघस्य निघ्नो निघनधनघनो घण्टिकाघण्टकण्ठो  विस्तीर्णाकारकर्णो वनवनजमनाः पापतापप्रहन्ता। दाता पाताखिलानां विजयकलयिता भद्रभावस्य भर्त्ता धीध्वान्तध्वंसदक्षो धृतिधनसुधियो रातु शं श्रीगणेशः।। (३) निघ्नः कुत्स्नभयस्य सादरमहो विघ्नप्रदोपि द्विषां मग्नश्चैव निरन्तरं श्रुतिततौ लग्नः सुखे संपदि। भग्नो येन मनोरथो निजरुचा ब्रध्नस्य तेजःपतेः नूत्नज्ञाननिधिं ददातु सदयो नग्नप्रभोर्नन्दनः॥ (४) विघ्नोत्तापविनाशनाय जलदो विघ्नासुरायान्तको विघ्नाम्भोधरवारणाय पवनो विघ्नाब्धये कुम्भभूः। विघ्नक्ष्मारुहखण्डनाय परशुर्विघ्नाग्नये वारिदो विघ्नाम्भोजविमर्दनाय रदनी तं स्तौमि विघ्नेश्वरम्।। (५) स्थूलः शान्तमना विशालजठरो यो बुद्धिदाता स्वयं यन्नामस्मरणेन यान्ति विपदः सर्वाग्रवन्द्योपि यः। विद्यादानपरायणः शुभकरः संसारदुःखापहो वन्
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पञ्चदेवताध्यानम्
January 07, 2021
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Dhyanamala

Ko Kim ka: - Sanskrit subhashitam

*६२३ . ।। को किं कः ।।*

*कोऽतिभारः समर्थानां* 
          *किं दूरे व्यवसायिनाम् ।*
*को विदेशः सविद्यानां* 
          *कः परः प्रियवादिनाम् ॥*

समर्थ व्यक्तींसाठी कोणता भार अधिक आहे ? काम करणाऱ्यांसाठी कोणते अंतर दूर आहे ? सुविद्य लोकांसाठी कोणता देश विदेश आहे ? आणि सर्वांशी आपुलकीने बोलणाऱ्यांसाठी कोण परकं आहे ? 

समर्थ लोगों के लिए कौन सा भार  अधिक हैं ? व्यवसायियों के लिए कौन सा अंतर दूर हैं ? विद्वानों के लिए कौनसा देश विदेश है ? और
प्रियवादियों के लिए कौनसा व्यक्ति पराया हैं ?

What is unsurmountable for the capable . Which distance is far for the hard-working . Which country is foreign for the learned . Who is no stranger for the soft-spoken person .

Rajinikanth Sanskrit Sloka

ரஜனீ-காந்த-காத்ரஸ்ய
ரஜனீ-சர-வைரிண: |
ரஜோ-ஹீநஸ்ய பாதாப்ஜ-
ரஜ: கணாச்ச பாது மாம் ||

रजनीकान्तगात्रस्य
रजनीचरवैरिणः।
रजोहीनस्य पादाब्ज-
रजःकणाश्च पातु माम्॥

ரஜனீ (இரவு) போன்ற கருமை நிறம் உடைய அழகிய திருமேனியை உடையவனும்,
ரஜனீ (இரவு)-இல் சஞ்சரிக்கும் அஸுரர்களின் எதிரியும்,
ரஜோகுணம், தமோகுணம் அற்ற சுத்தஸத்வமயனுமான ஸ்ரீமந் நாராயணனின் திருவடிகளிலுள்ள
ரஜஸ் (பாத தூளி) நம்மைக் காக்கட்டும்.

😜 இதற்கும் ரஜினியின் பிறந்த நாளுக்கும் எந்த வித சம்பந்தமும் இல்லை.

Sunday, July 11, 2021

Which follows what ?-Sanskrit subhashitam

*६२० . ।। अनुसरणम् ।।*

*सत्यानुसारिणी लक्ष्मीः*  
          *कीर्तिस्त्यागानुसारिणी ।*
*अभ्याससारिणी विद्या* 
          *बुद्धिः कर्मानुसारिणी ॥*

लक्ष्मी सत्याचं अनुसरण करते , किर्ती त्यागाचं , विद्या अभ्यासाचं आणि बुद्धी कर्माचं अनुसरण करते . 

लक्ष्मी सत्य को अनुसरती हैं , कीर्ति त्याग को , विद्या अभ्यास को और बुद्धि कर्म को अनुसरती हैं ।

Wealth is the follower of Truth , Fame is the 
follower of Sacrifice , Knowledge is the follower of Persuit and Wisdom is the follower of _Karma_ .

3 things that float like oil on water - Sanskrit subhashitam

|| ॐ ||

|| सुभाषित- रसास्वादः||[३७२]

'' संकीर्णसुभाषित ''

'' वार्तां च कौतुकवती विमला च विद्या , लोकोत्तरः परिमलश्च कुरङ्गनाभे|

तैलस्य बिन्दुरिव वारिणि दुर्निवार , मेतत्रयं प्रसरति स्वयमेव लोके || ''

अर्थ—कुछ विशेष कौतुकास्पद वार्ता , विशुद्ध ज्ञान , और कस्तुरीमृग के नाभि का सुगंध ,ये तीनों भी पानी में डाले तेल के बूंद जैसे फैलते हें| स्ययं प्रसृत हो जाते हें |

गूढार्थ—कुछ चीजो को प्रसिद्धि की आवश्यकता ही नही होती हें | गुणों के कारण ये अपने आप लोगों में फैल जाती हें |

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

डॉ. वर्षा प्रकाश टोणगांवकर

पुणे / महाराष्ट्र

 

Friday, July 9, 2021

Interview of Brahmasri.Mani Dravida Shahstrigal on his traditional learning in Sanskrit

A really interesting, inspiring, must watch video
By Brahmarshi Sri Mani Dravida Shastrigal on his traditional learning of shastras

Long compound sentence for describing Ganga in Sanskrit

अहिः = सर्पः
अहिरिपुः = गरुडः
अहिरिपुपतिः = विष्णुः
अहिरिपुपतिकान्ता = लक्ष्मीः
अहिरिपुपतिकान्तातातः = सागरः
अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धः = रामः
अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ता = सीता
अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरः = रावणः
अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयः = मेघनादः
अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्ता = लक्ष्मणः
अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदाता = हनुमान्
अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजः = अर्जुनः
अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजसखा = श्रीकृष्णः
अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजसखिसुतः = प्रद्युम्नः
अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजसखिसुतसुतः = अनिरुद्धः
अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजसखिसुतसुतकान्ता = उषा
अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजसखिसुतसुतकान्तातातः = बाणासुरः
अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजसखिसुतसुतकान्तातातसम्पूज्यः = शिवः
अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजसखिसुतसुतकान्तातातसम्पूज्यकान्ता = पार्वती
अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजसखिसुतसुतकान्तातातसम्पूज्यकान्तापिता = हिमालयः
अहिरिपुपतिकान्तातातसम्बद्धकान्ताहरतनयनिहन्तृप्राणदातृध्वजसखिसुतसुतकान्तातातसम्पूज्यकान्तापितृशिरोवहा = गङ्गा, सा मां पुनातु इत्यन्वयः |

Wednesday, July 7, 2021

Svabhava - Sanskrit subhashitam

*६१९ . ।। स्वभावः ।।*

*उपकर्तुं प्रियं वक्तुं* 
          *कर्तुं स्नेहमकृत्रिमम् ।*
*सुजनानां स्वभावोऽयं* 
          *केनेन्दुः शिशिरी कृतः ॥*

उपकार करणे , प्रिय बोलणे आणि अकृत्रिमपणे प्रेम करणे हा सज्जनांचा स्वभावच आहे . चन्द्राला शितल कोणी बनवलं ? तो तर त्याचा स्वभावच आहे .

उपकार करना , प्रिय बोलना और अकृत्रिम स्नेह करना ये तीन सज्जनों के स्वभाव के प्रमुख लक्षण हैं । चन्द्रमा को किस ने शीतल बनाया हैं ? वह तो उस का स्वभाव ही हैं ।

Helpfulness , pleasant speech , cultivation of 
genuine friendship these are the primeval nature of the cultured . The moon is cool because of its own innate qualities .

Anugraha bhashanam 1979 in sanskrit by HH.Abhinava Vidyateertha Mahaswamigal

Sanskrit texts taught through Kannada

Namaste!
ತಿಳಿಗನ್ನಡದ ಮೂಲಕ ಸಂಸ್ಕೃತ ತಿಳಿಯಲು ಹಾರ್ದಿಕ ಸ್ವಾಗತ ... ಪ್ರಾಯಶಃ ಪ್ರಥಮ ಪ್ರಯತ್ನ!
Yes. You may search Youtube...
 
 
Sanskrit texts like Yoga Sutra, Kumara Sambhava, Bhagawad Gita with Advaita
Commentary, Raghu Vamsha, Uttara Rama Charita, Hitopadesha, Siddhanta
Kaumudi etc are taught through Kannada. Explanation in English and
Sanskrit, teaching Grammar through Board Work - are pioneered. Recorded
online classes are shared with noble intent.
*Dhanyawad for Subscribing, Watching, Sharing and Sending Your Valuable
Feedback...*
Dr. R. Suresha
Department Of Studies in Sanskrit, University of Mysore.
99808-33466

Tuesday, July 6, 2021

End - Sanskrit subhashitam

५८६ . ।। अन्तः ।।

मरणान्तानि वैराणि
          प्रसवान्तञ्च यौवनम् ।
कुपितं प्रणयान्तञ्च
          याचितान्तं च गौरवम् ॥

मृत्यूमुळे वैराचा अंत होतो तर अपत्याला जन्म दिल्यामुळे तारुण्याचा अंत होतो . प्रणयामुळे संतापाचा अन्त होतो आणि इतरांसमोर याचना केल्यामुळे स्वगौरवाचा अंत होतो . 

मृत्यु के कारण बैर का अन्त होता हैं तो प्रसव के कारण यौवन का अन्त होता हैं । प्रणय के कारण गुस्से का अन्त होता हैं और याचना के कारण स्वगौरव का अन्त होता हैं ।

Enmity comes to an end by death . Youth ends by giving birth . Anger comes to an end by love . Self-esteem comes to an end in begging before others .

Sanskrit puzzle

प्रहेलिका।

कश्चन तडागः अस्ति। तडागस्य प्रत्येकं कोणे एकैकं मन्दिरम् अस्ति। अर्थात् चत्वारि मन्दिराणि सन्ति। 

कश्चन अर्चकः प्रतिदिनम् आगत्य चतुर्ष्वपि मन्दिरेषु पुष्पैः पूजां करोति।

सः अर्चकः कानिचन पुष्पाणि आनीय आदौ तडागे स्नानं करोति तदनन्तरं सः पूजां करोति। 
यदा सः पुष्पाणि प्रक्षालयितुं जले निमज्जयति तदा पुष्पाणि द्विगुणीभवन्ति।

तेभ्यः पुष्पेभ्यः कानिचन पुष्पाणि उपयुज्य प्रथमे मन्दिरे पूजां करोति। 
पुनश्च अवशिष्टानि पुष्पाणि जले निमज्जयति, तानि च पुष्पाणि पुनः द्विगुणीभवन्ति। 

पुनश्च सः द्वितीये मन्दिरे तेभ्यः पुष्पेभ्यः कानिचन पुष्पाणि उपयुज्य पूजां करोति। 

एवमेव सर्वेष्वपि मन्दिरेषु यदा सः पूजां समापयति तदा तस्य हस्ते एकमपि पुष्पम् अवशिष्टं न भवति। 

सर्वेष्वपि मन्दिरेषु सः समानरूपेण पुष्पाणि उपयुज्य पूजां करोति। 

इदानीं प्रश्नः अस्ति यत् सः कति पुष्पाणि आनयति? एकस्मिन् मन्दिरे च सः कति पुष्पाणि उपयुज्य पूजां करोति? 
*-प्रदीपः!*

Thursday, July 1, 2021

Sanskrit grammar joke

*कार्तिकः*- चत्वारि ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग पदानि वदतु ।
*रमण:*- अवी
*कार्तिकः*-❌
*रमण:*- तन्त्री
*कार्तिकः*-❌
*रमण:*- तरी
*कार्तिकः*-❌
*रमण:*- लक्ष्मी
*कार्तिकः*-❌
*रमण:*- ☹️
*कार्तिकः*- _अवीतन्त्रीतरीलक्ष्मी सुलोपो न कदाचन ।_ 
इयम् अवी:I
इयं तन्त्री:।
इयं तरी: ।
इयं लक्ष्मी: ।
इत्येव 🙂

Maths - Sanskrit puzzle

प्रथममगमदह्ना योजने यो जनेशः ।
तदनु ननु कयाऽसौ ब्रूहि यातोऽध्ववृद्ध्या ॥
अरिकरिहरणार्थं योजनानामशीत्या ।
रिपुनगरमवाप्तः सप्तरात्रेण धीमन् ॥

 O intelligent one, a king covers 2 yojanas in his first day, and covers a distance of 80 yojanas to reach a rival's city in 7 days to defeat him ( capture his elephants). How much extra did he cover on each day, assuming he travelled in arithmetic progression

Monday, June 28, 2021

An ode to jackfruit - Sanskrit poem

Courtesy: Sri.Ramakrishna Pejathayee

॥ तस्मै नमो भगवते पनसाय तुभ्यम् ॥

योऽन्तः प्रविश्य मम वाचमिमां प्रसुप्तां
सञ्जीवयत्यखिलशक्तिधरः स्वधाम्ना ।
अन्यांश्च हस्तचरणश्रवणत्वगादीन्
प्राणान् नमो भगवते पनसाय तुभ्यम् ॥१॥ (सक्षमायाचनम्)

घर्मादपेतकरुणादुरुदाहधर्माद्
वर्षाच्च भूरिविरुवत्सलिलप्रकर्षात् ।
त्रात्वा निजं रसमयानि फलानि दत्से
तत्र त्वदीयमधुरप्रकृतिर्निदानम् ॥२॥
    
बाह्येऽजिरे विधरतोत्कटकण्टकानि
बाह्येतरे च मधुमन्ति फलोत्तमानि ।
सत्यं सनातनमिदं भवता स्फुटं यद्
व्यक्ता भवेन्न वपुषा प्रकृतिर्जनस्य ॥३॥

दाक्ष्यं श्रमं च सहनां च धरेन्नृणां य-
स्तेनैव तावकरसो भवतीह लभ्यः ।
सञ्चोदनाय भविनां सुगुणेष्वमीषु
मन्ये स्वयं त्वमवहस्तदिदं स्वरूपम् ॥४॥

आमं नु तेमनमुखेषु नियुञ्जते त्वां
पक्वं च पायसमुखेषु लषन्ति लोकाः ।
धन्यस्त्वमेव यदुपैषि दशासु सर्वा-
स्वेवं जनातिशयितां जननार्थवत्ताम् ॥५॥

काष्ठैस्तव प्रचलिता भुवि नैकयज्ञाः
पर्णैश्च ते कलशकर्म समेति पूर्तिम् ।
पीठादिकान्यपि भवत्त्वगपेक्षकाणि
प्रेम त्वयि क्रतुभुजामपि वागगम्यम् ॥६॥

स्तुत्यानया पनस! नन्द यथार्थगत्या
प्रेष्ठं वरं च वितर त्वमुदारमत्या ।
येनाप्नुयामकृतपुण्यचयैर्दुरापं
त्वां हायनेषु निखिलेषु विना प्रयासम् ॥७॥ 

फलश्रुतिः -
यः स्तोत्रमेतदनघं पठति प्रभाते
भक्त्या समाहितमना नियतेन्द्रियश्च ।
सोयं न याति पनसान्मनुजो वियोगं
जन्मान्तरेष्वपि पुनर्लभतेsपवर्गम् ।।८।।

डा. रामकृष्णपेजत्तायः

Monday, June 21, 2021

If you know behave like an idiot - Sanskrit subhashitam

५७६ . ।। आचरणं ।।

नापृष्टः कस्यचिद् ब्रूयान्न     चान्यायेन पृच्छतः ।
जानन्नपि हि मेधावी    जडवल्लोक आचरेत् ॥

व्यक्तीने कोणी विचारल्या शिवाय सल्ला देऊ नये . तसेच कोणी अन्ययाने वा कपटबुद्धीने काही विचारत असेल , तरीही काही बोलू नये . बुद्धीमान व्यक्तीने अशांसमोर अज्ञानी असल्यासारखे वागावे . 

व्यक्ति को किसी के बिना पूछे ही नहीं बोलना चाहिए । तथा यदि कोई अनीति से एवं अन्यायपूर्वक प्रश्न करे , तब भी नहीं बोलना चाहिए । ज्ञानवान् होकर भी उन के समक्ष मूढ़ के सदृश आचरण करना चाहिए । 

A person should not explain anything , unless asked . Nor answer a person whose intention is  improper . Let a wise man , though he knows , behave, as if, an idiot .

Friday, June 18, 2021

How to search a word in Bhagavad Gita? - Sanskrit

http://bhagavadgita.org.in/search     This site is the one with search facility.  Wonderful.