|| अष्टावक्र गीता ||
|| चातुर्मासस्य ज्ञानयज्ञः ||
समिधा [१४]
|| तृतीयोऽध्यायः ||
'' अन्तरत्यक्तकषायस्य निर्द्वंद्वस्य निराशिवः|
यदृच्छायाऽगतो भोगो न दुःखाय न तुष्टये || ''
अर्थ—अन्तःकरण का मालिन्य जिसने त्यागा हें,जो द्वंद्वरहित और आशारहित हो गया हें,जिसको यदृच्छा से प्राप्त होनेवाला भोग दुःखदायक नही होता हें अथवा तुष्टिदायक भी नही होता हें |
विशेषार्थ—अनासक्त , निर्द्वद्व और निरपेक्ष व्यक्ति को यदृच्छा [अचानक] से सामने आया सुख और दुःख का कोई महत्त्व नही रहता हें |
योगी का मुख्य लक्षण ही सुख दुःख विरहित सहजता से जीवन जीना हें|
'' सन्तुष्टो येन केनचित् ''| [ भगवद्गीता अध्याय १२ / १९ ]
कल से चतुर्थोऽध्यायः|
ॐॐॐॐॐॐॐ
|| तस्मै श्री अष्टावक्राय नमः ||
डॉ. वर्षा प्रकाश टोणगांवकर
पुणे / महाराष्ट्र
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