Saturday, December 12, 2020

Contended - Ashtavakra gita sanskrit

|| अष्टावक्र गीता ||

|| चातुर्मासस्य  ज्ञानयज्ञः ||

समिधा [१४]

||  तृतीयोऽध्यायः ||

'' अन्तरत्यक्तकषायस्य निर्द्वंद्वस्य निराशिवः|

यदृच्छायाऽगतो भोगो न  दुःखाय न तुष्टये  || ''

अर्थ—अन्तःकरण का मालिन्य  जिसने त्यागा हें,जो द्वंद्वरहित और आशारहित हो गया हें,जिसको  यदृच्छा से प्राप्त होनेवाला भोग दुःखदायक  नही होता हें अथवा तुष्टिदायक भी नही होता हें |

विशेषार्थ—अनासक्त , निर्द्वद्व और निरपेक्ष व्यक्ति को यदृच्छा [अचानक] से सामने आया सुख और दुःख का कोई महत्त्व नही रहता हें |

योगी का मुख्य लक्षण ही सुख दुःख विरहित सहजता से जीवन जीना हें|

'' सन्तुष्टो येन केनचित् ''| [ भगवद्गीता अध्याय १२ / १९ ]

कल से चतुर्थोऽध्यायः|

ॐॐॐॐॐॐॐ

|| तस्मै श्री अष्टावक्राय नमः ||

डॉ. वर्षा प्रकाश टोणगांवकर

पुणे / महाराष्ट्र 

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