Tuesday, March 9, 2021

Praising a naiyayika - Sanskrit

|| ॐ ||


|| सुभाषित रसास्वादः || [३३३]

  '' नैय्यायिक प्रशंसा ''

'' ज्ञानाब्धिरक्षिचरणः कणभक्षकश्च, श्रीपक्षिलोऽप्सुदयनः स च वर्धमानः|

गङ्गेश्वरः शशधरो बहवश्च नव्या, ग्रन्थैर्व्यरुन्धत इमे हृदयान्धकारम् || ''

अर्थ—ज्ञान के सागर के समान अक्षपाद, कणाद ,श्रीपक्षिल , उदयन, वर्धमान गंगेश्वर ,शशधर तथा अन्य बहुत से नए पंडितों ने अपने ग्रन्थो के द्वारा हृदय के अन्धकार को अवरूध्द किया हें / दूर किया हें |

गूढार्थ—इन सब आदरणीय नैय्यायिकों ने अपनी विद्वत्ता से जो ग्रन्थ लिखे हें, उनके कारण लोगों के हृदयका अन्धकार दूर हो गया हें |

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

डॉ. वर्षा प्रकाश टोणगांवकर

पुणे / महाराष्ट्र 

No comments:

Post a Comment