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" *संस्कृत-गङ्गा* " ( ३३ )
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आज से नया विषय प्रारंभ कर रही हू। इस श्रृंखला में "पुराण--वाड़्मय "पर लिखुंगी। पहले पुराणों का अर्थ फिर पुराणों की संख्या और फिर पुराणों में वर्णित विषय।
हिन्दु समाज में किसी भी धर्मकृत्य के संकल्प में "श्रृतिस्मृतिपुराणोक्त" यह शब्द प्रयोग आता है। अर्थात् इस समाज के परम्परागत धर्म का प्रतिपादन श्रुतियों (वेद), स्मृतियों (मनु-याज्ञवल्क्यादि के धर्मशास्त्र विषयक ग्रन्थ) और पुराणों में मूलतः हुआ है।श्रुति और स्मृति में प्रतिपादित आचारधर्म का विधान त्रैवर्णिकों के लिए ही है।किन्तु पुराणों में प्रतिपादित धर्म सभी मानवमात्र के लिए है।
"एषः साधारणः पन्थाः साक्षात् कैवल्यसिध्दिदः।"
अर्थात् मोक्षप्राप्ति कराने वाला यह (पुराणोक्त धर्म) सर्वसाधारण है ऐसा पद्मपुराण में कहा गया है। सदाचार,नीति,भक्ति इत्यादि मानवोद्धारक तत्त्वों का उपदेश पुराणों ने अपनी रोचक,बोधक तथा सरस शैली में भरपूर मात्रा में किया है। पुराण कथाओं के कुछ अतिशययोक्तिपूर्ण ,तर्कविसंगत एवं असंभाव्य अंशो की ओर निर्देश करते हुए उनकी कटु आलोचना कुछ चिकित्सक वृत्ति के विद्वानों ने की है, परन्तु भारतीय परम्परा का यथोचित आकलन होने के लिए वैदिक वाड़्मय के समान पुराण वाड़्मय का भी ज्ञान अनिवार्य है,इसमें मतभेद नही हो सकते।
"पुराण" शब्द की निरुक्तिमूलक व्याख्या ,"पुरा नवं भवति" (अर्थात् जो प्राचीन होते हुए भी नवीन होता है) एवं यस्मात् पुरा ह्यनतोदं पुराणं तेन तत्स्मृतम्।(अर्थात्( पुरा+अन) प्राचीन परम्परा की जो कामना करता है) इत्यादि वाक्यों से मनीषियों ने बताया है।
कल पुराणों का लक्षण ।
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डाॅ. वर्षा प्रकाश टोणगांवकर
पुणे / महाराष्ट्र
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