|| *ॐ* ||
" *सुभाषितरसास्वादः* "
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" *वैद्यनीति* " ( २३२ )
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*श्लोक*----
" वैद्यानां शारदी माता , पिताच कुसुमाकरः ।
यमदंष्ट्रा स्वसा प्रोक्ता , हितभुड्मितभुग्रिपुः " ।।
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*अर्थ*----
शरद ऋतु यह वैद्य की माता है और वसंत ऋतु यह पिता है ।
तो मृत्यु का दांत यह बहन मानी जाती है और हितकारक और तोलनाप कर खाने वाला यह वैद्य का शत्रु माना गया है ।
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*गूढ़ार्थ*----
शरद ऋतु वैद्य की माता है क्यों कि शरद ऋतु में ठंड बढ जाने से बहुत लोग बिमार हो जाते है और उन्हे वैद्य के पास जाना पडता है इसलिये शरद ऋतु माता के समान वैद्य की चिन्ता करता है । वसंत ऋतु तो निरोगी माना जाता है किन्तु तब धुप बढने लगती है और ठंड भी रहती है तो कफप्रकृती वालों को वैद्य के पास जाना पडता है । पिता के समान ही वसंत ऋतु कभी ठंड और कभी गर्म रहता है।
अगर रोगी मृत्यु को प्राप्त हो गया तो वह वैद्य के बहन समान हो जाता है क्यों जैसी बहन ससुराल चली जाती है तो वह परायी हो जाती है वैसे ही रोगी एकबार मृत्यु को प्राप्त हो गया तो वह फिर वैद्य के पास लौटकर नही आता । और आख़िर मे जो मितभुक और हितभुक है वह तो कभी वैद्य के पास जायेगा ही नही तो वह सबसे बडा वैद्य का शत्रु होता है ।
समाज पर आधारित वैद्य का व्यवसाय ऋतु पर भी आधारित होता है । इसपर और भी मत अपेक्षित है ।
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डाॅ. वर्षा प्रकाश टोणगांवकर
पुणे / नागपुर महाराष्ट्र
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