Monday, June 25, 2018

Sakshi gopal story in Hindi

🌺साक्षी गोपाल जी🌺                

 भारत में साक्षी गोपाल नामक एक मंदिर है।(कृष्ण को प्राय: गोपाल कहते हैं)यह गोपाल मूर्ति किसी समय पर वृन्दावन के एक मंदिर में रखी हुई थी।
     एक बार दो ब्राह्मण,जिनमें एक वृद्ध था और दूसरा युवा,वृन्दावन की यात्रा पर निकले।यात्रा लम्बी थी और उन दिनों रेलगाड़ियाँ नहीं थीं,अत: यात्रियों को अनेक कष्ट उठाने पड़ते थे। वृद्ध व्यक्ति युवक का अत्यंत कृतज्ञ था,क्योंकि युवक ने यात्रा में उसकी काफी सहायता की थी। वृन्दावन पहुँचने पर उसने कहा, "हे युवक,तुमने मेरी बहुत सेवा की है। मैं तुम्हारा अत्यंत कृतज्ञ हूँ। मैं चाहता हूँ कि तुम्हारी इस सेवा के बदले में तुम्हें कुछ पुरस्कार दूँ।"
       उस युवक ने कहा, "महाशय,आप वृद्ध हैं,मरे पिता के समान हैं। आपकी सेवा करना मेरा कर्तव्य है। मुझे कोई पुरस्कार नहीं चाहिए।"
     उस वृद्ध पुरुष ने हठ किया, "नहीं, मैं तुम्हारा अत्यंत कृतज्ञ हूँ,मैं तुम्हें पुरस्कार अवश्य दूँगा।" तब उस वृद्ध ने उस युवक से अपनी पुत्री का विवाह करने का वचन दे दिया।
     यह वृद्ध पुरुष अत्यंत धनी था और वह युवक,विद्वान ब्राह्मण होते हुए भी अत्यंत निर्धन था। अत: युवक ने इस बात पर विचार करते हुए कहा, "आप यह वचन न दें,क्योंकि आपका परिवार इस बात पर कभी सहमत न होगा। मैं इतना गरीब हूँ और आप इतने कुलीन हैं। अत: यह विवाह नहीं हो सकेगा। श्री विग्रह के समक्ष इस प्रकार वचन न दें।"
     यह वार्तालाप मंदिर में गोपाल-कृष्ण के श्रीविग्रह के समक्ष हो रहा था,और वह युवक चिंतित था कि कहीं श्रीविग्रह का अपमान न हो जाए। फिर भी युवक के तर्कों के बावजूद वृद्ध पुरुष विवाह की बात पर अड़ा रहा। वृन्दावन में कुछ दिनों तक रहने के बाद दोनों घर लौट आये। वृद्ध पुरुष ने अपने ज्येष्ठ पुत्र से कहा कि तुम्हारी बहन का विवाह उस निर्धन ब्राह्मण युवक से करना है। इस पर उसका ज्येष्ठ पुत्र अत्यंत क्रुद्ध हुआ और उसने कहा "आपने मेरी बहन के लिए ऐसा दरिद्र पति क्यों चुना है ? यह विवाह नहीं हो सकता।" 
     उस वृद्ध पुरुष की पत्नी भी आ गई और कहने लगी, "यदि हमारी पुत्री का विवाह उस युवक से करेंगे तो मैं आत्महत्या कर लूँगी।"
     इस प्रकार वृद्ध पुरुष बहुत उलझन में पड़ गया। कुछ समय बाद ब्राह्मण युवक को चिंता होने लगी कि, " उस वृद्ध पुरुष ने अपनी पुत्री का विवाह मुझसे करने का वचन श्रीविग्रह के समक्ष दिया था। अब वह उसे पूरा करने क्यों नहीं आ रहा है ?" अत: उस वृद्ध पुरुष को उसके वचन की याद दिलाने के लिए उसके पास गया।
      उस तरुण ने कहा," आपने भगवान् कृष्ण के समक्ष वचन दिया था,किन्तु अब आप उसे पूरा नहीं कर रहे हैं। ऐसा क्यों ?"
     वह वृद्ध पुरुष मौन था। वह अपनी उस उलझन के लिए कृष्ण से प्रार्थना करने लगा। अपनी पुत्री का विवाह इस  युवक के साथ करके वह अपने परिवार में क्लेश पैदा करना नहीं चाह रहा था। उसी दौरान उसका ज्येष्ठ पुत्र बाहर आ गया और वह उस ब्राह्मण युवक पर दोषारोपण करने लगा, " तुमने तीर्थस्थान में मेरे पिता को लूट लिया। तुमने कोई नशीली वस्तु देकर उसका सारा धन हर लिया और अब ये कहने आये हो कि उन्होंने मेरी सबसे छोटी बहन को तुम्हें देने का वचन दिया है। तुम धूर्त हो।"
     इस प्रकार वहाँ बहुत हंगामा मच गया और लोग एकत्र होने लगे। वह समझ गया कि वृद्ध पुरुष अब भी विवाह पर सहमत है,किन्तु उसके परिवार के लोग इसे होने नहीं दे रहें। उसके ज्येष्ठ पुत्र के हो-हल्ला मचाने के कारण लोग वहाँ एकत्र होने लगे। वह ब्राह्मण युवक भी उच्च स्वर में बोलने लगा कि इस वृद्ध पुरुष ने श्री विग्रह के समक्ष वचन दिया था, किन्तु अब परिवार के विरोध के कारण अपने वचन को पूरा नहीं कर पा रहा है। जेष्ठ पुत्र नास्तिक था। अत: उसने अचानक युवक को बीच में रोकते हुए कहा, "तुम कहते हो भगवान साक्षी हैं; तो ठीक है;यदि भगवान् यहाँ आकर साक्षी दें कि  मेरे पिता ने वचन दिया है,तो तुम मेरी बहन के साथ विवाह कर सकते हो।"
     युवक ने कहा, "हाँ,मैं कृष्ण से कहूँगा कि वे साक्षी के रूप में आयें।"उसे विश्वास था कि भगवान् आयेंगे। सभी समक्ष यह तय हुआ की यदि वृद्ध पुरुष के वचन की साक्षी के लिए कृष्ण वृन्दावन से आयेंगे,तो कन्या का विवाह उस युवक से कर दिया जाएगा।"
     वह ब्राह्मण युवक लौटकर वृन्दावन आया और गोपाल कृष्ण से प्रार्थना करने लगा, "हे भगवन ! आपको मेरे साथ चलना होगा।"वह इतना निष्ठावान भक्त था कि वह कृष्ण से वैसे ही बातें कर रहा था,जैसे कोई अपने मित्र से बातें करता है। उसने यह नहीं सोचा कि गोपाल तो मात्र एक मूर्ति हैं। वह तो उन्हें साक्षात ईश्वर मान रहा था। अचानक मूर्ति बोल उठी, " तुमने कैसे सोच लिया कि मैं तुम्हारे साथ चल सकता हूँ ? मैं एक मूर्ति हूँ। मैं कहीं नही जा सकता ।" 
युवक ने उत्तर दिया, " यदि मूर्ति बोल सकती है तो वह चल सकती है।"
     अन्त में श्री विग्रह ने कहा, "अच्छा, तब तो मैं तुम्हारे साथ चलूँगा,किन्तु एक शर्त है। तुम किसी भी दशा में मुझे देखने के लिए पीछे नहीं मुडोगे। मैं तुम्हारे पीछे पीछे चलूँगा और तुम मेरे नूपुरों की ध्वनि से जान सकोगे कि मैं आ रहा हूँ।"
  
  युवक ने बात मान ली और वे दूसरे नगर को जाने के लिए वृन्दावन से चल पड़े। जब यात्रा पूरी होने को थी और वे उस युवक के गाँव में प्रवेश करने ही वाले थे कि युवक को नूपुरों की ध्वनि सुनाई पड़ना बंद हो गई। उसे चिंता हुई, " अरे ! कृष्ण कहाँ गये ? धैर्य न धर सकने के कारण उसने पीछे मुड़कर देखा। उसने पाया कि मूर्ति स्थिर खड़ी थी। चूँकि उसने पीछे मुड़कर देखा था,इसलिए अब मूर्ति आगे नहीं जाने वाली थी। वह तुरंत दौड़कर नगर में पहुँचा और लोगों से कहने लगा कि चल कर देखें कि कृष्ण साक्षी रूप में आये हैं। सब लोग स्तंभित हो गए कि इतनी बड़ी मूर्ति इतनी दूर से चलकर आयी है। उन्होंने श्री विग्रह के सम्मान में उस स्थल पर एक मंदिर बनवा दिया। और आज भी लोग भगवान् की पूजा साक्षी-गोपाल के रूप में करते हैं।
     अत: हमें यह निष्कर्ष निकालना होगा कि चूंकि ईश्वर सर्वत्र हैं,अत:वे अपनी मूर्ति में भी हैं,अपनी छवि में भी हैं।

सदा जपिये
हरे कृष्ण हरे कृष्ण,कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम,राम राम हरे हरे🌹

हरि बोल ।

No comments:

Post a Comment