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|| सुभाषित- रसास्वादः||[३७२]
'' संकीर्णसुभाषित ''
'' वार्तां च कौतुकवती विमला च विद्या , लोकोत्तरः परिमलश्च कुरङ्गनाभे|
तैलस्य बिन्दुरिव वारिणि दुर्निवार , मेतत्रयं प्रसरति स्वयमेव लोके || ''
अर्थ—कुछ विशेष कौतुकास्पद वार्ता , विशुद्ध ज्ञान , और कस्तुरीमृग के नाभि का सुगंध ,ये तीनों भी पानी में डाले तेल के बूंद जैसे फैलते हें| स्ययं प्रसृत हो जाते हें |
गूढार्थ—कुछ चीजो को प्रसिद्धि की आवश्यकता ही नही होती हें | गुणों के कारण ये अपने आप लोगों में फैल जाती हें |
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डॉ. वर्षा प्रकाश टोणगांवकर
पुणे / महाराष्ट्र
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