*७०५ . ।। हन्ति ।।*
*आशा धृतिं हन्ति समृद्धिमन्तकः*
*क्रोधः श्रियं हन्ति यशः कदर्यता ।*
*अपालनं हन्ति पशूंश्च राजन्न्*
*एकः क्रुद्धो ब्राह्मणो हन्ति राष्ट्रम ॥*
हे राजा ! अत्याधिक आशावादी असल्याने मनुष्याचा आत्मविश्वास व साहस नष्ट होते तर मृत्यूने संपत्ती नष्ट होते . क्रोध केल्याने प्रसन्नता नष्ट होते तर कंजूषपणाने यश नष्ट होते . योग्य पालन न केल्याने पशुधन नष्ट होते तर एक विद्वान ब्राम्हण क्रोधित झाल्याने संपूर्ण राष्ट्र नष्ट होते .
हे राजन ! अत्यधिक आशावादी होने से मनुष्य का आत्मविश्वास और साहस तथा मृत्यू से समृद्धि नष्ट हो जाती हैं । क्रोध करने से प्रसन्नता तथा कंजूसी से यश नष्ट हो जाता हैं । सही देख-रेख न होने से पालतू पशु नष्ट हो जाते हैं और यदि कोई विद्वान् ब्राह्मण क्रुद्ध हो जाता हैं तो फिर सारे राष्ट्र का नाश हो जाता हैं ।
Oh King ! Excessive hope and desire destroys courage & self-confidence and death destroys prosperity . Likewise anger destroys happiness and miserly behaviour destroys fame . If proper care is not taken domestic animals are destroyed and if a learned Brahmin is angry then it results in destruction of the entire Kingdom .
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