|| *ॐ* ||
" *सुभाषितरसास्वादः* "
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" *स्त्रीनीति* " ( ११९ )
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*श्लोक*-----
" पुरुषाभ्यधिका प्रीतिः स्त्रीणामिति न निश्चितम् ।
वरीयसी भवत्येषा निर्विवादमिदं पुनः " ।।
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*अर्थ*----
पुरुष प्रेम करता है और स्त्री भी प्रेम करती है । किन्तु अगर उनके प्यार की तुलना की जायेगी तो स्त्री का प्रेम आकार से ज्यादा भरेगा ऐसे निश्चितता से कह नही सकते , किन्तु स्त्री का प्रेम प्रकार से ज़रुर पुरुषों से वरिष्ठ निकलेगा । इसमें कोई मतभेद नही ।
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*गूढ़ार्थ*-------
स्त्री का प्रेम पुरुष से वरिष्ठ कैसा ? स्त्रीयों के प्रेम में उत्कंठा और तीव्रता अधिक होती है । प्रेम स्त्री का जीवनसर्वस्व होता है तो पुरुषों के आयुष्य का प्रेम केवल एक भाग होता है । इसिलिए पुरुषों पर
" कठोर ह्रदय " का आरोप भी लगता है शायद ।
अनुभवी सुभाषितकार ने हमे स्त्री के प्रेम के बारे में बहुत ही सुन्दर तरीके से समझाया है ।
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डाॅ. वर्षा प्रकाश टोणगांवकर
पुणे / महाराष्ट्र
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