|| *ॐ* ||
" *सुभाषितरसास्वादः* "
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" *पातु वः* " ( २०५ )
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*श्लोक*----
" युगपत्स्वगण्डचुम्बनलोलौ पितरौ निरीक्ष्य हेरम्बः।
तन्मुखमेलनकुतुकी स्वाननमपनीय परिहसन् पायात् ।। "
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*अर्थ*----
गणपति के कपोल का चुम्बन लेने की इच्छा एक ही क्षण को शिव-- पार्वती को हुई और यह बात गणपति के ध्यान में आयी ।
जब शिव-- पार्वती कपोल चूमने के लिये झुके तब धीरे से गणपति ने अपना मुंह पीछे हटा लिया तब क्या हुआ होगा यह आप ही सोचिए । ऐसा बुद्धिनायक गणपति आप सब की रक्षा करे।
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*गूढ़ार्थ*----
जगन्नपितरौ और बुद्धिनायक गणेश के उपर कितनी सुंदरता से सुभाषितकार ने मानवीयता आरोपित की है न ? ऐसा लगता है एक सुखी कुटुंब में या हमारे परिचित कुटुंब में यह घटना घट रही है।
लेकीन यह तो जगन्नपितरौ और बुद्धिनायक गणेश की बात हो रही है। गणेश बुद्धिनायक है इसलिये उसे अपने माता --पिता के मन की उसको चूमने की बात समझ गयी इसलिये उसको शरारत सुझी और जब शिव--पार्वती उसको चूमने के लिये झुके तब वह धीरे से पीछे सरक गया और फिर जो घटा उसे देखकर गणपति शररात से हंसने लगा । है न मजेदार ?
ऐसा हंसनेवाला बाल गणेश आप सब की रक्षा करे ।
महाराष्ट्र का सब से बडा त्यौहार गणेशोत्सव की आप सभी को ह्रदय से शुभकामनाएं ।
बुद्धिनायक गणेश महाराष्ट्र का कुलदैवत है और आई तुळजाभवानी महाराष्ट्र की कुलस्वामीनी । 👏👏👏👏👏
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डाॅ. वर्षा प्रकाश टोणगांवकर
पुणे / नागपुर महाराष्ट्र
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