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" *सुभाषितरसास्वादः* "
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" *नवरसवर्णनम्* " ( १५३ )
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" *करुणरसः* "
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*श्लोक*----
" गृहिणी सचिवः सखी मिथः प्रियशिष्या ललिते कलाविधौ ।
करुणाविमुखेन मृत्युना हरता त्वां बत किं न मे ह्रतम " ।।
( रघुवंशम् )
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*अर्थ*----
प्रिय पत्नी इंदुमती के मृत्यु के कारण विलाप करते समय अज कह रहा है ---- " तेरे और मेरे कितने रिश्ते है ! तुम मेरी गृहिणी थी,
मेरी सचिव थी , अनन्य सखी थी , जोडीदार थी । संगीत , नृत्यादि , ललितकला क्षेत्र में प्रियशिष्या थी । किन्तु हाय ! उस निष्करुण क्रुर काल तुम्हे ले गया । उसने तुम्हे नही तो मेरा सर्वस्व हरण किया है !
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*गूढ़ार्थ*---
अज -- इन्दुमती यह जोडी रघुवंश की काफ़ी प्रसिद्ध जोडी है ।
यह सब श्रीराम के वंशज है । और रघुवंशम् कवि कुलगुरु कालिदास का प्रसिद्ध काव्य है ।
यहाँ पर इन्दुमती के देहान्तर के पश्चात् अज राजा ने उसके लिये जो शोक किया वह लिखा गया है ।
और वैसे भी -- करुण रस का स्थायी भाव शोक ही है ।
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डाॅ. वर्षा प्रकाश टोणगांवकर
पुणे / नागपुर महाराष्ट्र
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