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" *वन्देसंस्कृतमातरम्* "
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" *लौकिकन्यायकोशः* " ( १२७ )
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" *महामत्स्यतीरन्यायः* "
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महान् मत्स्यः तीरात् तीरान्तरं प्रति गच्छति । तदा सः तीरात् भिन्नः न
भवति । तीरस्य कोऽपि परिणामः तस्मिन् न भवति ।
तथैव आत्मा जाग्रदादिस्थितिषु सर्वत्र स्पन्दते चेदपि तासां कोऽपि परिणामः आत्मनि न भवति । स सर्वथा निर्लिप्त एव भवति इति भावः।
*यथा* ---- " महामत्स्य उभे कूले सञ्चरति पूर्वं च अपरं च ।
एवमेवायं पुरुष एतान् सञ्चरति स्वप्नान्तं बुद्धान्तं चेति " ।।
( बृहदारण्यकोपनिषद ४ -३ -१८ )
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डाॅ. वर्षा प्रकाश टोणगांवकर
पुणे / नागपुर महाराष्ट्र
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