Wednesday, June 6, 2018

Vidya increases by practice-Sanskrit subhashitam

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*अभ्यासाद्धार्यते विद्या कुलं शीलेन धार्यते।*
*गुणैर्मित्राणि धार्यन्ते अक्ष्णं क्रोधश्च धार्यते।।*
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*निरन्तर अभ्यास के द्वारा ही विद्या अक्षुण्ण रखी जा सकती है तथा कुल की मर्यादा और प्रसिद्धि शीलवान के द्वारा ही बनी रह सकती है। दूसरों से स्थायी मित्रता तभी बनी रह सकती है जब कि सभी संबन्धित लोग गुणवान हों, तथा कोई व्यक्ति क्रोध पर तभी नियन्त्रण रख सकता है यदि वह व्यवहार कुशल हो।*
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*One can retain the knowledge gained by him through regular practice (recapitulation), and the name and fame of a dynasty is retained by the righteous and kind behaviour of its members. Likewise, friendship among persons is permanent if they are talented and virtuous, and anger can be controlled if the person concerned is prevalent.*
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*🙏🌹🚩सुप्रभातम् 🚩🌹🙏*