Monday, May 28, 2018

Sanskrit subhashitam

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⛳🌞 विदग्धा वाक् 🌞⛳

नागुणी गुणिनं वेत्ति गुणी गुणिषु मत्सरी ।
गुणी च गुणरागी च सरलो विरलो जनः ॥
--सुभाषितरत्नभाण्डागारः ४५.१३

गणहीन व्यक्ति गुणवान को नहीं पहचान सकता। गुणवान व्यक्ति अन्य गुणवान व्यक्तियों से जलता है। (स्वयं) गुणवान होकर (अन्य गुणवान के) गुणों से अनुराग रखने वाला सरल व्यक्ति बहुत कम होता है।

One who has no merit cannot appreciate merit. However, a merited person is jealous of another meritorious person. Thus a simple man of merit who appreciates the meritorious is very rare.

--Subhashitha Samputa, Bharatiya Vidya Bhavan
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