Thursday, July 22, 2021

Mind is napumsalinga ... Did Panini err? - Sanskrit subhashitam

|| *ॐ* || 
    " *सुभाषितरसास्वादः* "
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    " *चमत्कृति* " ( ११८ )
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*श्लोक*---
    " नपुंसकमिति  ज्ञात्वा  प्रियायै  प्रेषितं  मनः ।
      तत्तु  तत्रैव  रमते  हताः  पाणिनिना  वयम्  " ।।
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*अर्थ*----
 मन  यह  शब्द  नपुंसक  है । ऐसा  पाणिनी  का  व्याकरण  बताता  है ।
  इसी  भरोसे  पर  मैंने  अपना  मन  प्रिया  के  पास  भेजा  पर  हाय! 
   वह  पुरुष  बनकर  वही  रममाण  हो  गया । पाणिनीने  हमारा  घात  किया ।
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*गूढ़ार्थ*----
 सुभाषितकार  ने  कितने  खुबी  से  ' मन ' शब्द  पर  लिखा  है ।
 पाणिनीय  व्याकरण  में  तो  ' मन ' शब्द  नपुंसक  लिङ्ग  में  है  ही किन्तु  किसी  भी  भाषा  में  यह  शब्द  नपुंसक  लिङ्ग में  ही है ।
 मन  को  नपुंसक  सोचकर  किसी  प्रियकर  ने  बिनधास्तता  से  ' मन ' को  प्रिया  के  पास  भेज  दिया  यह  सोचकर  वह  तो  अपने  पास  वापस  ही  आयेगा किन्तु  हाय ! मन  ने  प्रिया  के  पास  पहुंचते  ही  खुद  को  बदल  लिया  वह  पुल्लिंग  हो  गया  और  प्रिया  के  पास  ही  रहना  उसने  पसंद किया । अब  प्रियकर  बिना  मन  का  हो  गया  तो  व्याकरणकार  पाणिनी  को  दोष  दे  रहा  है  कि -- कैसे  ' मन ' शब्द  उसने  नपुंसक लिङ्ग में  रख दिया ।  संस्कृत  साहित्य  की  यह  सब  खुबसूरती  देखते  ही  बनती है ।
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*卐卐ॐॐ卐卐*
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डाॅ. वर्षा  प्रकाश  टोणगांवकर 
पुणे  /  महाराष्ट्र 
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