|| *ॐ* ||
" *सुभाषितरसास्वादः* "
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" *चमत्कृति* " ( ११८ )
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*श्लोक*---
" नपुंसकमिति ज्ञात्वा प्रियायै प्रेषितं मनः ।
तत्तु तत्रैव रमते हताः पाणिनिना वयम् " ।।
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*अर्थ*----
मन यह शब्द नपुंसक है । ऐसा पाणिनी का व्याकरण बताता है ।
इसी भरोसे पर मैंने अपना मन प्रिया के पास भेजा पर हाय!
वह पुरुष बनकर वही रममाण हो गया । पाणिनीने हमारा घात किया ।
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*गूढ़ार्थ*----
सुभाषितकार ने कितने खुबी से ' मन ' शब्द पर लिखा है ।
पाणिनीय व्याकरण में तो ' मन ' शब्द नपुंसक लिङ्ग में है ही किन्तु किसी भी भाषा में यह शब्द नपुंसक लिङ्ग में ही है ।
मन को नपुंसक सोचकर किसी प्रियकर ने बिनधास्तता से ' मन ' को प्रिया के पास भेज दिया यह सोचकर वह तो अपने पास वापस ही आयेगा किन्तु हाय ! मन ने प्रिया के पास पहुंचते ही खुद को बदल लिया वह पुल्लिंग हो गया और प्रिया के पास ही रहना उसने पसंद किया । अब प्रियकर बिना मन का हो गया तो व्याकरणकार पाणिनी को दोष दे रहा है कि -- कैसे ' मन ' शब्द उसने नपुंसक लिङ्ग में रख दिया । संस्कृत साहित्य की यह सब खुबसूरती देखते ही बनती है ।
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डाॅ. वर्षा प्रकाश टोणगांवकर
पुणे / महाराष्ट्र
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