|| ॐ ||
|| सुभाषित रसास्वादः ||[३४२]
'' ऋण ''
'' पापं कर्तुमृणं कर्तुं मन्यन्ते मानवाः सुखम् |
परिणामोऽतिगहनो महतामपि नाशकृत् || ''
अर्थ—मनुष्य पाप करने में तथा ऋण करने में सुख का अनुभव करता है, परन्तु उसका परिणाम इतना भयंकर होता है कि इससे बड़ों-बड़ों का नाश हो जाता है |
गूढार्थ— सुभाषितकार ने हमे पाप और ऋण से क्या स्थिति होती है, इसके बारे में हमे बताया है | पाप से नरकयातना और ऋण से पुनर्जन्म निश्चित ही है |
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डॉ. वर्षा प्रकाश टोणगांवकर
पुणे / महाराष्ट्र
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