|| *ॐ* ||
" *सुभाषितरसास्वादः* "
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" *स्त्रीप्रशंसा* " ( १८९ )
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*श्लोक*-----
" न हयैर्न न मातङ्गैर्न रथैर्नच पत्तिभिः ।
स्त्रीणामपाङ्गदृष्ट्यवै जीयते जगतां त्रयम् " ।। ( शार्ङ्गधरपद्धतिः)
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*अर्थ*----
अश्व , हाथी , रथ या फिर बडा सैन्य इसके द्वारा विजय पाना संभव है, किन्तु ऐसा समझना गलत है । सत्य तो यही है की स्त्री का एक नेत्रकटाक्ष ही तीनों लोगो को जीता देता है ।
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*गूढ़ार्थ* -----
स्त्रियों के नेत्रशक्ति का बहुत सुन्दर तरीके से वर्णन सुभाषितकार ने किया है । वैसे भी बडे - बडे विद्वानों ने स्त्री को नेत्र के कारण ही जादूगरनी माना है । और हमारे चित्रपटसृष्टि के गाने में भी स्त्रियों के नेत्रों को महत्त्वपूर्ण स्थान मिला है । राजे महाराजे भले ही रथ ,हाथी सैन्य के द्वारा युद्ध जीतते होंगे पर स्त्री तो एक नेत्रकटाक्ष से तिनों लोगों को जीतती है ।
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डाॅ. वर्षा प्रकाश टोणगांवकर
पुणे / महाराष्ट्र
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