Thursday, June 11, 2020

Cuckoo and its courage - Sanskrit subhashitam

|| *ॐ* ||
    " *सुभाषितरसास्वादः* "
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    " *कोकिल--अन्योक्ति* " (२०४ )
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      *श्लोक*---
  "  तावत्कोकिल  विरसान्यापय  दिवसान्वनान्तरे  निवसन् ।
      यावन्मिलदलिमालः  कोऽपि  रसालः  समुल्लसति ।। " 
        (  भामिनीविलासः ( पंडितराज  जगन्नाथ ) )
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   *अर्थ*----
    हे  कोकिल ,  ये  थोडे से  कष्ट  के  दिन  वन  के  किसी  कोने  में  बैठकर  गुजार  दो ।  जबतक  वसंतऋतु  का  आगमन  नही  हो  जाता  और  उसपर  सुमधुर  आम्रफल  नही  आ  जाते  और  भ्रमर  गुंजारव  नही  करते  और  वसंतॠतु  का  वह  सुखदायी  काल  नही  आ  जाता  तब  तक  तुम्हे  धैर्य  धारण  करना  चाहिए  और  राह  देखनी  चाहिए ।
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   *गूढ़ार्थ*----
    यहाँ  पर  सुभाषितकार  ने  जिंदगी  की  बहुत  कड़वी  सच्चाई  हे  कोकिल  के  माध्यम  से बतायी  है ।  वसंतॠतु , मधुर आम्रफल , आल्हाददायी वातावरण, गुंजारव  करते  हुए  भ्रमर  यह  सब  खुशी  की  और  सुख  की  निशानी  है ।  एकान्तवास  दुःख  दर्शाता  है ।  मनुष्य  का  जीवन  भी  इसी तरह  से  सुख  और  दुःख  से  भरा  हुआ  है । दुःख  या  अवनती  का  काल  हर  एक  के  जीवन  में  कभी  ना  कभी  आता  ही  है।
   उसे  धैर्य  से  पार  करना  चाहिए ।  तब  तक  कष्ट में  शांती  से  जीवन  बिताना  चाहिए ।  कितनी  बडी  बात  सिर्फ  दो  पंक्तियों  में  हमे  सुभाषितकार  ने  बतायी  है ।
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*卐卐ॐॐ卐卐*
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  डाॅ.  वर्षा  प्रकाश  टोणगांवकर 
पुणे  /  महाराष्ट्र 

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