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" *सुभाषितरसास्वादः* "
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" *कोकिल--अन्योक्ति* " (२०४ )
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*श्लोक*---
" तावत्कोकिल विरसान्यापय दिवसान्वनान्तरे निवसन् ।
यावन्मिलदलिमालः कोऽपि रसालः समुल्लसति ।। "
( भामिनीविलासः ( पंडितराज जगन्नाथ ) )
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*अर्थ*----
हे कोकिल , ये थोडे से कष्ट के दिन वन के किसी कोने में बैठकर गुजार दो । जबतक वसंतऋतु का आगमन नही हो जाता और उसपर सुमधुर आम्रफल नही आ जाते और भ्रमर गुंजारव नही करते और वसंतॠतु का वह सुखदायी काल नही आ जाता तब तक तुम्हे धैर्य धारण करना चाहिए और राह देखनी चाहिए ।
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*गूढ़ार्थ*----
यहाँ पर सुभाषितकार ने जिंदगी की बहुत कड़वी सच्चाई हे कोकिल के माध्यम से बतायी है । वसंतॠतु , मधुर आम्रफल , आल्हाददायी वातावरण, गुंजारव करते हुए भ्रमर यह सब खुशी की और सुख की निशानी है । एकान्तवास दुःख दर्शाता है । मनुष्य का जीवन भी इसी तरह से सुख और दुःख से भरा हुआ है । दुःख या अवनती का काल हर एक के जीवन में कभी ना कभी आता ही है।
उसे धैर्य से पार करना चाहिए । तब तक कष्ट में शांती से जीवन बिताना चाहिए । कितनी बडी बात सिर्फ दो पंक्तियों में हमे सुभाषितकार ने बतायी है ।
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डाॅ. वर्षा प्रकाश टोणगांवकर
पुणे / महाराष्ट्र
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