अभिमानो न कर्तव्यः
एकदा शिक्षकः कोऽपि
पदातिर्गच्छति क्वचित् ।
तत्राध्वनि तटिन्येका
तरणीया हि नौकया।।(1)
एक बार कोई अध्यापक पैदल जा रहा था। रास्ते में एक नदी थी ,जिसे किश्ती से पार करना था।
नावारुढो नदीमध्ये
पृष्टवान्नाविकं गुरुः।
निरक्षरं तथा वृद्धं
जानाति गणितं भवान्।।(2)
नाव पर बैठकर नदी के मध्य गुरु जी ने उस बूढ़े अनपढ़ नाविक से पूछा - क्या तुम गणित जानते हो ?
श्रुत्वेति च न जानेऽहं
जगादाध्यापकः पुनः।
कर्णधार वृथा नूनं
चतुर्थांशं हि जीवितम्।।(3)
मैं गणित नहीं जानता , यह सुनकर अध्यापक ने कहा - हे नाविक ! तेरा पच्चीस प्रतिशत जीवन बेकार हो गया ।
कथयति ततः प्राज्ञः
भूगोलः कथ्यते च किम् ।
प्रत्यवदत्तदा वृद्धः
श्रीमन्नस्मि निरक्षरः।।(4)
तब उस विद्वान शिक्षक ने कहा---भूगोल किसे कहते हैं ? तब उस वृद्ध ने उत्तर दिया --श्रीमान जी ! मैं तो अनपढ़ हूं।
भूगोलं नैव जानाति
संख्यातमपि यो नरः।
वृथार्धं जीवितं तस्य
भारभूतो हि भूतले।।(5)
जो व्यक्ति भूगोल नहीं जानता,गणित नहीं जानता, उसका आधा जीवन बेकार है और वह धरती पर बोझ है।
तूष्णीभूय वचस्तस्य
शृणोति तरिचालकः।
धारामध्ये यदा नौका
झञ्झावातस्तदोत्थितः।।(6)
मल्लाह उसकी बात चुपचाप सुनता रहा। जैसे ही नौका नदी की धारा के बीच पहुंची, तभी तूफान आ गया।
नाविकेन तदा पृष्टः
शिक्षको ज्ञानगर्वितः।
जलेन पूरिता नौका
जानासि तरणं गुरो।।(7)
तब मल्लाह ने ज्ञानगर्वित शिक्षक से पूछा - गुरु जी ! नाव पानी से भर रही है ।तैरना जानते हो ?
तरणं नैव जानामि
रक्षणं कुरु केशव।
वृथा ते जीवितं सर्वं
नाविकः प्रोक्तवाँस्तदा।।(8)
शिक्षक बोला -मैं तैरना नहीं जानता । हे भगवान् ! मेरी रक्षा करो । तब नाविक बोला --तुम्हारा तो शतप्रतिशत जीवन बेकार हो गया ।
पुस्तकेषु च या विद्या
पठितव्या न संशयः।
व्यवहारः कला चापि
शास्त्रानुशासनं तथा ।।(9)
इसमे कोई सन्देह नही कि पुस्तकों मे जो विद्या है, पढनी चाहिए । परन्तु व्यवहार, कला शास्त्रों की आज्ञा का भी ज्ञान होना चाहिए ।
अभिमानो न कर्तव्यः
शास्त्रज्ञानस्य कोविदैः।
तरन्त्यन्ये निमज्जन्ति
शास्त्रज्ञानाभिमानिनः।।(10)
विद्वानों को शास्त्र ज्ञान का अभिमान नहीं करना चाहिए । क्योंकि दूसरे (साधारण व्यक्ति ) तर जाते हैं और शास्त्रज्ञान के अभिमानी (भवसागर ) में डूब जाते हैं।
---- मार्कण्डेयो रवीन्द्र:
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