Tuesday, February 4, 2020

Drink the essence like a swan- Sanskrit Subhashitam

|| *ॐ* ||
                " *सुभाषितरसास्वादः* "
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               " *व्यवहारनीति* " ( ५६ )
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  *श्लोक*---
    " अनंतशास्त्र॔  बहुला  च  विद्या  अल्पश्च  कालो  बहुविघ्नता  च ।
     यत्सारभूतं  तदुपासनीयं  हंसो  यथा  क्षीरमिवाम्बुमध्यात्  " ।।
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*अर्थ*-----
शास्त्रे  अनंत  है ।  ज्ञान  का  महासागर  है ।  शास्त्र  और  विद्या  संपादन  करने  के  लिए  बहुत  समय  लगता  है ।  और  इसके  हिसाब से  मनुष्य  की  आयु  अल्प  है ।  उस  आयु  में  भी  अनेक  विघ्न  है ।  जितना  सारभूत  होगा  उतना  ही  लेना  चाहिए ।  हंस  जैसा  नीरक्षीरविवेक  से  ग्रहण  कर  लेना  चाहिए ।
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*गूढ़ार्थ*-----
विद्या  और  कला  असंख्य  है ।  १४  विद्या  और ६४ कला  प्रमुख  है ।  
इस  सब  का  अभ्यास  करना  कठिन  है ।  क्योंकि  पुस्तकों  की उपलब्धता , विषय की  सरलता और  हमारी  समझने  की  काबिलियत ।
मार्गदर्शन  करने वाले लोग और हमारी  स्मरणशक्ति । उस पर यह  सब  चीजें  सिखने  के लिए  हमारी  आयु  भी  तो  अल्प  ही  होती  है ।
यही  सब  सोचके   सुभाषितकार  कहता  है , जो सारभूत  होगा  उतना  ही  हमे  लेना  चाहिए ।  जो  गौण  भाग  होगा  वह  हमे  छोड़  देना  चाहिये ।
जैसे  हंस  दूध  और  पानी  में  से  दूध  ग्रहण  कर  लेता  और  पानी  छोड़  देता  है । ऐसा  नीरक्षीरविवेक  करना  हमे  आना  चाहिए ।
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*卐卐ॐॐ卐卐*
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डाॅ. वर्षा  प्रकाश  टोणगांवकर 
पुणे  /   महाराष्ट्र 
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