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" *सुभाषितरसास्वादः* "
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" *व्यवहारनीति* " ( ५६ )
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*श्लोक*---
" अनंतशास्त्र॔ बहुला च विद्या अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च ।
यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात् " ।।
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*अर्थ*-----
शास्त्रे अनंत है । ज्ञान का महासागर है । शास्त्र और विद्या संपादन करने के लिए बहुत समय लगता है । और इसके हिसाब से मनुष्य की आयु अल्प है । उस आयु में भी अनेक विघ्न है । जितना सारभूत होगा उतना ही लेना चाहिए । हंस जैसा नीरक्षीरविवेक से ग्रहण कर लेना चाहिए ।
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*गूढ़ार्थ*-----
विद्या और कला असंख्य है । १४ विद्या और ६४ कला प्रमुख है ।
इस सब का अभ्यास करना कठिन है । क्योंकि पुस्तकों की उपलब्धता , विषय की सरलता और हमारी समझने की काबिलियत ।
मार्गदर्शन करने वाले लोग और हमारी स्मरणशक्ति । उस पर यह सब चीजें सिखने के लिए हमारी आयु भी तो अल्प ही होती है ।
यही सब सोचके सुभाषितकार कहता है , जो सारभूत होगा उतना ही हमे लेना चाहिए । जो गौण भाग होगा वह हमे छोड़ देना चाहिये ।
जैसे हंस दूध और पानी में से दूध ग्रहण कर लेता और पानी छोड़ देता है । ऐसा नीरक्षीरविवेक करना हमे आना चाहिए ।
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डाॅ. वर्षा प्रकाश टोणगांवकर
पुणे / महाराष्ट्र
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