|| *ॐ* ||
" *सुभाषितरसास्वादः* "
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" *प्रहेलिकाः* " ( कोडे ) ( ६८ )
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*श्लोक*----
" वृक्षाग्रवास्यामि न पक्षिराजः
बहूनि नेत्राणि न चास्मि शक्रः ।
श्रीरामपत्न्याश्च दधेऽभिधानं
हेमन्तकाले उपभोगयोग्यम् "।।
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*अर्थ*---
वृक्ष पर रहता हूँ किन्तु पक्षी नही । बहूत सारी ऑखे है किन्तु शक्र नही हूँ । श्रीराम की पत्नी के कारण मुझे नाम मिला है और हेमन्त ऋतु में मेरा उपभोग लिया जाता है।
तो मैं कौन हूँ ?
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*गूढ़ार्थ*----
Sitafal
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डाॅ. वर्षा प्रकाश टोणगांवकर
पुणे / महाराष्ट्र
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