"||ॐ||"
"सुभाषितरसास्वाद्ः"
"समस्यापूर्ति" [ ३०१ ]
श्लोकः—
"विद्यायां दुर्मदो यस्य कार्पण्यं विभवे सति|
तेषां दैवाभिशप्तानां सलिलादग्निरूत्थितः"
अर्थः—[ समस्या ]
पानी से अग्नि कैसे निकल सकता है?
अब इस समस्या का उत्तर किसी कवीने ऐसा दिया ---
विद्या सिखकर भी उन्मत्त और वैभव होकर भी कंजूस ऐसे लोग होते है, उनको दैव का शाप है| ऐसा मानना चाहिए क्यों की पानी से अग्नि निकलने जैसा उनका विपरीत जीवन होता है|
गुढार्थः—
सुभाषितकार ने यहाँ पर बहुत अच्छे से हमें बताया है की विद्या होकर भी अगर व्यक्ति नम्र नहीं है तो वह पानी से निकले हुए अग्नि के समान ही है| और धन होने के बाद भी अगर दान नही
देता है तो उसका जीवन भी विपरीत ही है| जैसे पानी से अग्नि|
पानी से अग्नि निकलना जैसे कभी नही होता वैसे ही|
"ॐॐॐॐ"
डॉ. वर्षा प्रकाश टोणगांवकर
पुणे / महाराष्ट्र
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