Friday, January 25, 2019

Sanskrit subhashitam

"||ॐ||"
"सुभाषितरसास्वाद्ः"
"समस्यापूर्ति" [ ३०१ ]
श्लोकः—
"विद्यायां दुर्मदो यस्य कार्पण्यं विभवे सति| 
तेषां दैवाभिशप्तानां सलिलादग्निरूत्थितः" 
अर्थः—[ समस्या ] 
पानी से अग्नि कैसे निकल सकता है? 
अब इस समस्या का उत्तर किसी कवीने ऐसा दिया --- 
विद्या सिखकर भी उन्मत्त और वैभव होकर भी कंजूस ऐसे लोग होते है, उनको दैव का शाप है| ऐसा मानना चाहिए क्यों की पानी से अग्नि निकलने जैसा उनका विपरीत जीवन होता है| 
गुढार्थः—
सुभाषितकार ने यहाँ पर बहुत अच्छे से हमें बताया है की  विद्या होकर भी अगर व्यक्ति नम्र नहीं है तो वह पानी से निकले हुए अग्नि के समान ही है| और धन होने के बाद भी अगर दान नही 
देता है तो उसका जीवन भी विपरीत ही है| जैसे पानी से अग्नि| 
पानी से अग्नि निकलना जैसे कभी नही होता वैसे ही| 
"ॐॐॐॐ" 
डॉ. वर्षा प्रकाश टोणगांवकर 
पुणे / महाराष्ट्र

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