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" *वन्देसंस्कृतमातरम्* "
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" *लौकिकन्यायकोशः* " ( १५६ )
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" *प्रपाणकरसन्यायः* " ( *पानकरसन्यायः*)
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शर्करा , लवणं , शुण्ठी इत्यादिनां वस्तूनां संमिश्रणेन एकः आस्वाद्यः पानकरसो भवति । एवमेव लोके परस्परभिन्नानां संमिश्रणेन विलक्षणरूपं लभ्यते । तथैव विभाव-- अनुभाव--संचारिभावानां मिश्रणेन विलक्षण रसाभिव्यक्तिः भवति ।
*यथा*--- सकलसह्रदयसंवादभाजा साधारण्येन स्वाकार इवाभिन्नोऽपि गोचरीकृतः चर्व्यमाणं नैकप्राणो विभावादिजीविप्यवधिः पानकरस न्यायेन चर्व्यमाणः------- ब्रह्मास्वादमिवानुभावयन् अलौकिक चमत्कारकारी शृङ्गारादिको रसः । ( काव्यप्रकाशचतुर्थोल्लासे )
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डाॅ. वर्षा प्रकाश टोणगांवकर
पुणे / नागपुर महाराष्ट्र
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