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" *वन्देसंस्कृतमातरम्* "
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" *लौकिकन्यायकोशः* " ( १४८ )
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" *सुवर्णन्यायः* "
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निकषेण तापेन घर्षणेन ताडनेन च सुवर्ण प्रकाशमयं क्रियते एवं पठनं परिप्रश्नः विचारणा-- इत्यादिभिः उपायैः अध्ययनं तेजस्वि भवति ।
*यथा*---
" हेम्नः संलक्ष्यते हि अग्नौ विशुद्धिः श्यामिकापि वा " ।। ( रघुवंशे -१-१० )
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डाॅ. वर्षा प्रकाश टोणगांवकर
पुणे / नागपुर महाराष्ट्र
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