Monday, August 13, 2018

For a shudra there is no sin

न शूद्रे पातकं किंचित् 
शूद्र में ज़रा भी पाप नहीं होता — मनुस्मृति 10 ,126
इसका अर्थ यह हुआ कि मनु के अनुसार ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य तो बड़े पापी हैं और अपने इन पापों से मुक्त होने के लिये उन्हें बड़े बड़े पापड़ बेलने पड़ते है लेकिन क्योंकि शूद्र बिलकुल निष्पाप है इसलिये उसे ऐसाकुछ करने कीजरूरत ही नहीं जिसे करनेवाला का मनु ने विधान किया है और जिसे सामान्य रूप से कोई ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य करना नहीं चाहता ।पूरी की पूरी मनुस्मृति सिर्फ़ ब्राह्मण क्षत्रिय के लिये ही लिखी गयी । शुद्रों के विषय में मनु का पक्षपात तो देखो —-
लिखते हैं कि ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य को चाहिये कि हिमालय से विन्ध्याचल पर्वत तक के प्रदेश में ही निवास करे , इससे बाहर न जाये । और शूद्र ? उसे तो छूट है , वह सारी पृथ्वी पर कहीं भी जा सकता है और बस सकता है —
एतान् द्विजातयो देशान् संश्रयेरन्प्रयत्नत : । 
शूद्रस्तु यंत्र तत्रैव निवसेद् वृत्तिकर्शित ।।

लेकिन देखो , इतना पक्षपात करने के बावजूद मनु शूद्रों की गालियाँ खा रहे हैं , उनकी कृति को जलाया जा रहा है ।

कृतघ्नता इसी का नाम है ।

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