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" *सुभाषितरसास्वादः* "
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" *सामान्यनीति* " ( १४९ )
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*श्लोक* ----
" सुखं हि दुःखाननुभूय शोभते घनान्धकारेष्विव दीपदर्शनम् ।
सुखाच्च यो याति नरो दरिद्रतां धृतःशरीरेण मृतः स जीवति " ।।
( मृच्छकटिकम् -- शूद्रकम् )
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*अर्थ* ----
घने अंधकार में बहुत समय तक रहने के बाद यदि दीपक देखा जाय तो मनुष्य को जितना आनन्द होगा उतना बहुत समय तक दुःख का अनुभव लेने के बाद मिलनेवाले सुख में होता है । किन्तु जो मनुष्य सुख और वैभव का उपभोग करने के बाद दरिद्री होता है वह शरीरधारी होकर भी वास्तविकता में मरा हुआ ही रहता है ।
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*गूढ़ार्थ*----
सुभाषितकार ने कितना भीषण वास्तव यहाँ पर कथन किया है यह सोचनेलायक ही है । सही में जिसने बहुत सुख और वैभव का उपभोग लिया है उसे किसी भी कारणवश यदि दरिद्रता आ जाये तो वह जिंदा होकर भी मृत जैसा ही हो जाता है ।
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डाॅ. वर्षा प्रकाश टोणगांवकर
पुणे / नागपुर महाराष्ट्र
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