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" *वन्देसंस्कृतमातरम्* "
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" *लौकिकन्यायकोशः* " ( १३६ )
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" *श्मशानकुसुमन्यायः* "
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श्मशाने प्रफुल्लानि कियन्ति वा सुन्दराणि पुष्पाणि निरुपयोगीनि एव भवन्ति । तेषां सुगन्धस्य सौन्दर्यस्य वा प्रशंसा कोऽपि न करोति।
तथैव अयोग्ये स्थले वर्तमानस्य गुणसंपन्नस्य गुणमाहात्म्यं कोऽपि न जानाति इति भावः ।
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डाॅ. वर्षा प्रकाश टोणगांवकर
पुणे / नागपुर महाराष्ट्र
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