*क्रोधो हि शत्रुः प्रथमो नराणां*
*देहस्थितो देहविनाशनाय।*
*यथा स्थितः काष्ठगतो हि वह्निः*
*स एव वह्निर्दहते च काष्ठम्।।"*
मनुष्य का मुख्य शत्रु क्रोध है। यह देह में रहता हुआ ही देह को नष्ट कर डालता है, जैसे लकडी में स्थित अग्नि लकडी को ही जला डालती है। आग जैसे अपने आधार लकडी को जला देती है, वैसे ही क्रोध भी अपने आधार शरीर को जला देता है।
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